Editorial Deep Dive

छत्तीसगढ़ी मनोरंजन का इतिहास: लोक परंपराओं से छॉलीवुड के उदय तक

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Reported By

Tarni Yadav

Published On

June 19, 2026

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छत्तीसगढ़ी मनोरंजन का इतिहास: लोक परंपराओं से छॉलीवुड के उदय तक

परिचय

छत्तीसगढ़ का मनोरंजन सफर प्राचीन आदिवासी कहानी कहने की परंपराओं से लेकर एक विकसित फिल्म उद्योग तक फैला हुआ है। यह लेख बताता है कि कैसे इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान सदियों से लोक कला और आधुनिक सिनेमा के माध्यम से विकसित हुई।


प्राचीन लोक और जनजातीय मनोरंजन की जड़ें

छत्तीसगढ़ की मनोरंजन परंपरा इसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति में गहराई से जुड़ी हुई है। गोंड, बैगा और परधी सहित 42 जनजातीय समुदायों का घर होने के कारण, इस राज्य ने सदियों तक जीवंत प्रदर्शन कलाओं को संरक्षित रखा।


पारंपरिक लोक नाट्य रूप:

पंडवानी: महाभारत की कहानियों का कथात्मक प्रस्तुतीकरण

तममा: संगीत आधारित नाटकीय प्रस्तुतियां

सुषार: गांव के त्योहारों का मनोरंजन

डखरैन: नृत्य और नाटकीय कहानी प्रस्तुतिकरण

ये प्रदर्शन गांव के त्योहारों, विवाह समारोहों और धार्मिक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा थे, जो पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखते थे।


पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म (1965)

आधुनिक युग की शुरुआत 1965 में “कही देबे संदेश” (ब्लैक एंड व्हाइट) से हुई, जो पहली छत्तीसगढ़ी भाषा की फिल्म थी।


फिल्म से जुड़े मुख्य तथ्य:

निर्देशक और निर्माता: मनु नायक (छत्तीसगढ़ी सिनेमा के संस्थापक)

विषय: अंतरजातीय प्रेम में भेदभाव

गीतकार: डॉ. हनुमंत नायडू

गायक: मोहम्मद रफी (2 गाने)

विशेष दर्शक: पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी

व्यावसायिक परिणाम: बॉक्स ऑफिस पर असफल


अंधकारमय दशक (1971–2000)

अगली छत्तीसगढ़ी फिल्म “घर द्वार” 1971 में आई, जिसका निर्देशन निरंजन तिवारी ने किया और निर्माण विजय कुमार पांडेय ने किया। यह भी व्यावसायिक रूप से असफल रही, जिससे निवेशक निराश हो गए। इसके बाद लगभग 30 वर्षों तक छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माण में सन्नाटा छा गया। इस दौरान कोई फिल्म नहीं बनी—पारंपरिक लोक कला ही मनोरंजन का मुख्य साधन बनी रही।


पुनर्जन्म – छॉलीवुड का उदय (2000)

साल 2000 में “मोर छैंहा भुइंया” के साथ उद्योग का पुनर्जन्म हुआ, जिसका निर्माण और निर्देशन सतीश जैन ने किया।


ब्लॉकबस्टर सफलता:

रिलीज: 27 अक्टूबर 2000

बजट: 20–30 लाख रुपये

कमाई: 2 करोड़ रुपये से अधिक

स्थिति: मेगा ब्लॉकबस्टर

फिल्म के रिलीज के तीन दिन बाद, 1 नवंबर 2000 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने छत्तीसगढ़ को एक अलग राज्य घोषित किया। इससे फिल्म और राज्य की पहचान के बीच एक मजबूत सांस्कृतिक संबंध बना। अब इस उद्योग को “छॉलीवुड” (छत्तीसगढ़ी + हॉलीवुड) कहा जाता है।


स्वर्ण युग (2005–वर्तमान)

“मोर छैंहा भुइंया” की सफलता ने निर्माताओं की रुचि को फिर से जीवित किया। 2005 में, महान गायिका लता मंगेशकर ने छत्तीसगढ़ी फिल्म “भकला” के लिए एक गीत रिकॉर्ड किया, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।


इस दौर की सुपरहिट फिल्में:

मया — निर्माता: रॉकी दासवानी, निर्देशक: सतीश जैन

तुरा रिक्शावाला

लैला टिप टॉप छैला अंगूठा छाप

मया दे दे मया ले ले

परदेशी के मया

झन भुलाओ मां बाप ला

इस दौर में 20–30 लाख के बजट वाली फिल्में नियमित रूप से 1 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई करने लगीं।


आज का छत्तीसगढ़ी मनोरंजन

आज छत्तीसगढ़ी मनोरंजन में फिल्म, संगीत, लोक नाट्य और डिजिटल कंटेंट शामिल हैं। राज्य की सांस्कृतिक पहचान सिनेमा के माध्यम से मजबूत रूप से प्रस्तुत होती है, जिसमें स्थानीय परंपराएं, बोलियां और सामाजिक कहानियां दिखाई जाती हैं।

छत्तीसगढ़ स्वदेश दर्शन ट्राइबल सर्किट के तहत 13 प्रमुख स्थलों के माध्यम से सांस्कृतिक पर्यटन को भी विकसित कर रहा है, जिससे यह एक विशिष्ट सांस्कृतिक गंतव्य के रूप में मजबूत हो रहा है। मनोरंजन उद्योग राज्य की सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है।


निष्कर्ष

प्राचीन पंडवानी कथाकारों से लेकर आधुनिक छॉलीवुड निर्देशकों तक, छत्तीसगढ़ी मनोरंजन क्षेत्र की मजबूत सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। 1965 में एक असफल फिल्म से लेकर करोड़ों कमाने वाले सफल उद्योग तक का सफर यह दिखाता है कि कला और राज्य की पहचान कितनी खूबसूरती से जुड़ सकती है। आज का छत्तीसगढ़ी सिनेमा परंपराओं का सम्मान करते हुए डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से नए दर्शकों तक पहुंच रहा है।

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